Catch Siding and Slip Siding in Railway: भारतीय रेलवे में स्टेशन अलग-अलग ऊंचाई में मौजूद होते हैं| खासकर घाट सेक्शन में जहाँ ट्रैक में ग्रेडिएंट दिया जाता है वहां पर ट्रेन के ब्रेक फेल होने जैसी घटना पर किसी भी दुर्घटना से बचने के लिए ट्रैक पर कैच साइडिंग और स्लिप साइडिंग दिए जाते हैं| आइये जानते हैं क्या होता है रेलवे में कैच साइडिंग और स्लिप साइडिंग (Slip Siding and Catch Siding in Railway):
भारतीय रेलवे में ट्रैक हमेशा एक लेवल पर ही रहे यह संभव नहीं| यदि जमीन में चढ़ाई या ढलान है, तो रोड की तरह रेलवे ट्रैक को भी धरती के सतह के साथ चढ़ाया या नीचे की तरफ किया जाता है| इंजीनियरिंग की भाषा में इसे ग्रेडिएंट कहते हैं|
ढलान (Falling Gradient) - जब हम किसी ऊँची सतह से निचली सतह की ओर जा रहे हों तो उसे ढलान कहते हैं| यदि ढलान या फॉलिंग ग्रेडिएंट 1 in 100 हो तो इसका अर्थ है कि प्रत्येक 100 मीटर सीधा चलने पर 01 मीटर लेवल नीचे आ जाएगा| डाउन ग्रेडिएंट या फॉलिंग ग्रेडिएंट को नीचे की तरफ तीर का निशान बनाकर ढलान को प्रदर्शित करा जाता है|
चढ़ाई (Rising gradient) - जब हम एक निचली सतह से ऊँची सतह की ओर चल रहे हों तो उसे चढ़ाई कहते हैं| यहाँ पर भी 1 in 100 का अर्थ है कि यदि ट्रेन 100 मीटर आगे चलेगी तो उसका लेवल 1 मीटर ऊपर चढ़ जायगा| राइजिंग ग्रेडिएंट को तीर का निसान ऊपर की ओर करके प्रदर्शित किया जाता है|
कैच साइडिंग क्या होता है (Catch Siding in Railway)
एक रेलवे स्टेशन के दोनों ओर के अन्तिम पाइंट्स के बीच के क्षेत्र को स्टेशन सैक्शन या यार्ड कहते हैं| और वहीँ यार्ड समाप्त होने के बाद दो रेलवे स्टेशनों के बीच के क्षेत्र को ब्लॉक सैक्शन कहते हैं| जब किसी स्टेशन के एण्ट्री ऐण्ड पर 1 in 80 या उससे ज्यादा की ढलान हो (Falling gradient) हो तो स्टेशन सैक्शन शुरु होने के पहले एक कैच साइडिंग बनाकर उसे मेन लाइन से पाइंट्स के द्वारा जोड़ दिया जाता है| वह पाइंट्स हमेशा कैच साइडिंग से जुड़ा रहता है| मेन लाइन को आगे वाले स्टेशन सैक्शन की ओर तभी जोड़ा जाता है जब स्टेशन से लाइन क्लियर मिल जाये|




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