अगला अधिकमास कब आएगा | पुरुषोत्तम मॉस 2020 (अधिक मास 2020) क्या होता है

Adhik maas 2020 - अधिक मास 2020 

कभी आपने यह सोचा है कि गर्मियां, सर्दियाँ, मानसून आदि साल के एक ही समय क्यों आते हैं? आज हम इसी विषय से शुरुआत करके अधिक मास को जानेंगे| उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में होने की वजह से भारत में गर्मियाँ मार्च-अप्रैल के समय आती हैं, सर्दियाँ नवंबर-दिसंबर में और मानसून का समय जून-जुलाई में आता है| मान लो अगर कैलेंडर विकसित ही नहीं हुए होते तो क्या इन सब महीनों का ऋतुओं से मेल करना संभव होता? हज़ारों साल पहले से ही समय की गणना के लिए कैलेंडर, संवत या पंचांग का उपयोग शुरू हो चूका था| अधिकमास या पुरुषोत्तम मास को समझने के लिए हमें सौर कैलेंडर और चंद्र कैलेंडर को भी समझना होगा|    

सौर कैलेंडर 

जो कैलेंडर सूरज पे आधारित थे (सौर कैलेंडर) वो पृथ्वी द्वारा सूरज का एक चक्कर लगाने की अवधि को अपना एक वर्ष मानते थे| किन्तु इसमें सटीक समय का होना आवश्यक था नहीं तो मार्च-अप्रैल में शुरू होने वाली गर्मी धीरे-धीरे नवंबर में आरम्भ होना शुरू हो जाती| कई सालों तक खोजने के बाद यह ज्ञात हो गया कि पृथ्वी सूरज का एक चक्कर लगाने में 365 दिन 5 घंटे और 48 मिनट्स का समय लेती है| और यह पता करने के बाद ही इस समय को 12 महीने में वितरित कर दिया गया|   

क्या आपको पता है कि ग्रेगोरियन कैलेंडर में 5 अक्टूबर से 14 अक्टूबर 1582 की तारीख कभी नहीं आयी !! 

चन्द्रसौर कैलेंडर 

हिन्दू पंचांग (जैसे की विक्रम सम्वत) एक चन्द्रसौर कैलेंडर होता है जिसके भी एक वर्ष में 12 महीने होते हैं और एक महीने की अवधी वही है जो समय चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में लगता है| कई सालों के अध्ययन के बाद यह समय भी ज्ञात कर लिया गया| चन्द्रमा, पृथ्वी की परिक्रमा औसतन 29.53 दिनों में पूरा करता है| इसका अर्थ है कि 12 महीनों में लगभग 354 दिनों का समय लगेगा| 

इस प्रकार चंद्र कैलेंडर और सौर कैलेंडर में प्रतिवर्ष लगभग 10 दिनों का अंतर हो जाता है| मान लो अगर 10 साल तक हम चंद्र कैलेंडर का उपयोग करते रहे तो हमारे भारत वर्ष में गर्मियां चैत्र-वैशाख (मार्च-अप्रैल) की बजाय श्रावण-भाद्रपद (जुलाई-अगस्त) में शुरू होने लगेंगी| इस तरह की दुविधा कभी उत्पन्न ना हो, इस कारण को ध्यान में रखते हुए चंद्र कैलेंडर का इस्तेमाल न करके चन्द्रसौर कैलेंडर का उपयोग करना उचित समझा गया|

कब होती है अधिकमास की आवश्यकता 

सौर कैलेंडर में एक वर्ष लगभग 365.25 दिनों का होता है| यानी साल में 12 महीने होने के कारण एक महीने में औसतन 30.437 दिन पड़ेंगे| वहीँ चंद्र कैलेंडर के हिसाब से एक माह 29.53 दिनों का होता है| अगर दोनों कैलेंडर में हर महीने के औसत अंतर की बात करें तो यह (30.437 - 29.53)= 0.9075 दिनों का होगा| इसी कारण चंद्र कैलेंडर में अगर हम हर (29.53/0.9075=) 32.5 महीनों बाद एक महीना जोड़ दें, तो चंद्र कैलेंडर चन्द्रसौर कैलेंडर बन जाएगा और एक ही माह में सम्पूर्ण 32.5 माह के उत्पन्न अंतर समाप्त होने से इसकी सौर कैलेंडर से समानता भी सिद्ध हो जायेगी|     


जो माह हर 32 माह के आसपास चंद्र कैलेंडर में जोड़ा जाता है वह साल में आने वाले 12 महीनों से अलग और अधिक होता है| यह उस साल का 13वा महीना होता है| इसीलिए इस माह को अधिकमास (Extra Month) कहते हैं|

अधिकमास कब-कब पड़ता है 

अधिकमास चन्द्रसौर कैलेंडर के हिसाब से साल का तेरवा महीना है| कई चन्द्रसौर कैलेंडर में अधिकमास को  एक निश्चित समय पर डाला जाता है, जैसे बुद्धिस्ट कैलेंडर में अधिकमास आषाढ़ महीने के बाद ही आता है| परन्तु कई भारतीय सम्वत में (विक्रम संवत) या पंचांग में इसका स्थान बदलता रहता है| 

सन 2018 में ज्येष्ठ महीने के पहले अधिक ज्येष्ठ माह आया था ठीक उसी तरह 2020 में आश्विन माह के पहले अधिक आश्विन मास आया है| जब भी अधिकमास पड़ता है तो आने वाले मास के नाम पर अधिकमॉस का नाम रखा जाता है| मार्गशीर्ष से माघ महीनों में अधिकमास नहीं पड़ता| और अधिक कार्तिक मास भी बहुत दुर्लभ होता है, जो आखरी बार सन 1964 में पड़ा था| 

2020 में 18 सितम्बर से 16 अक्टूबर तक अधिक आश्विन माह रहेगा फिर 17 अक्टूबर से आश्विन माह प्रारम्भ होगा| इसके बाद 'विक्रम सम्वत 2080' यानी सन 2023 में श्रावण मास व अधिकमास का पावन योग बनेगा|   

वशिष्ठ सिद्धांतः के हिसाब से पुरोषत्तम मास हर 32 महीने 16 दिन और 8 घाटी पर आता है| यहाँ पर एक घाटी का तात्पर्य एक दिन के 1/60 हिस्से से है जो 24 मिनट्स का समय है| 

संक्रांति और अधिकमास में संबंध 

अगर सूरज के दृष्टिकोण से अधिकमास को देखा जाए तो अधिकमास वह माह है (जिस माह में सक्रांति नहीं पड़ती अर्थात) जब सूरज किसी चंद्र माह में अपनी राशि (zodiac) नहीं बदलता| इसका मतलब अगर एक राशि में चंद्र माह की अमावस्या पड़ी है और अगले माह की अमावस्या में भी सूरज उसी राशि में मौजूद हो, तो उस माह को चन्द्रसौर कैलेंडर का अधिक माह(13वा माह) माना जाता है|      

मल मास    

हिन्दू धर्म में अधिकमास के दौरान सभी पवित्र काम वर्जित माने जाते हैं| यह माना जाता है कि अतिरिक्त होने के कारण इस मास के दौरान सभी विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, विवाह, गृहप्रवेश आदि आमतौर पर नहीं किये जाते| मलिन होने के कारण इस मॉस को 'मल मास' भी कहते हैं|

पुरोषत्तम मास

अधिकमास के अधिपति भगवान विष्णु माने जाते हैं| पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु का ही एक नाम है, इसलिए अधिकमास को 'पुरुषोत्तम मास'  नाम से भी पुकारा जाता है| इस विषय में एक बड़ी रोचक कथा पुराणों में पढ़ने को मिलती है| कहा जाता है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मॉस के लिए एक देवता निर्धारित किये| चूँकि अधिकमास सूर्य और चंद्र मॉस के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ, तो इसे अतिरिक्त मॉस का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार ना हुआ| ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान् विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मॉस का भार अपने ऊपर लें| भगवान् विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मलमास के साथ पुरोषत्तम मास भी बन गया|                  

अधिकमास में क्या करना चाहिए

हिन्दू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है| सम्पूर्ण भारत की हिन्दू धर्मपरायण जनता इस मास में पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, जप, भगवत भक्ति आदि धार्मिक कार्यों में सलंग्न रहती है| यह मान्यता है कि अधिकमास में किये गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किये गए पूजा-पाठ से अधिक फल मिलता है| इसलिए इस मास में श्रद्धालु जन अपनी पूरी श्रद्धा, भक्ति और शक्ति के साथ भगवान् की आराधना करते हैं|

आमतौर पर अधिकमास में हिन्दू श्रद्धालु व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, ध्यान, भजन कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते हैं| पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ-हवन के अलावा श्रीमद भगवत, श्री भगवत पुराण, श्री विष्णु पुराण आदि का श्रवण पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है| अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान् विष्णु हैं, इसलिए इस समय विष्णु मन्त्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है| ऐसा माना जाता है कि अधिकमास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले साधकों को भगवान् विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं|    

अधिकमास के महत्व की एक कथा

अधिकमास के लिए पुराणों में कई सुन्दर कथाएं सुनने को मिलती है| पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने एक बार ब्रह्मा जी को अपने कठोर तप से प्रसन्न कर लिया और उनसे अमरता का वरदान माँगा| क्यूंकि अमरता का वरदान निषिद्ध है, इसलिए ब्रह्मा जी ने उसे कोई भी अन्य वर मांगने को कहा|

तब हिरण्यकश्यप ने वर माँगा कि उसे संसार का कोई नर, नारी, पशु, देवता या असुर मार न सके| वह वर्ष के 12 महीने मृत्यु को प्राप्त न हो| जब वो मरे तो ना दिन का समय हो ना रात का| वह ना किसी अस्त्र से मरे ना किसी शस्त्र से| उसे ना घर में मारा जा सके ना ही घर से बाहर मारा जा सके| इस वरदान के मिलते ही हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर समझने लगा और खुद को भगवान घोषित कर दिया| समय आने पर भगवान् विष्णु ने अधिकमास में नरसिंघ अवतार लेकर यानी आधा पुरुष और आधे शेर के रूप में प्रकट होकर, शाम के समय, देहरी के निचे अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीर कर उसे मृत्य के द्वार भेजा| 

अधिकमास एकादशी 

अधिकमास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पद्मिनी विशुद्ध एकादशी और शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को परमा शुद्ध एकादशी कहते हैं|  
 
तिथि  महत्वता 
शुक्ल पक्ष 
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कृष्ण पक्ष  
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