ज्येष्ठ मास-Jyeshtha mas 2022 | Important Days in Jyeshth | महत्वपूर्ण तिथियां और महात्मय कथा

Jyeshtha - ज्येष्ठ  



Jyeshtha Important Days | Jyeshtha maas ki katha | 

सनातन संस्कृति के कैलेंडर (या पंचांग या संवत) में ज्येष्ठ को साल का तीसरा महीना माना जाता है| यह ग्रेगोरियन कैलेंडर के मई-जून में पड़ता है| इस साल 2022 में 'विक्रम संवत' (calendar) का 2079वा साल और 'शक संवत' के हिसाब से 1944वा साल का आरम्भ होगा| हम जानते हैं की भारत ने 1957 में 'शक संवत' को त्याहारों की गणना के लिए 'इंडियन नेशनल कैलेंडर' के रूप में अपनाया है, इसलिए वैशाख महीने में अमावस्या के बाद वाली प्रतिपदा, ज्येष्ठ की पहली तिथि होती है| 

ज्येष्ठ मास का नाम कैसे पड़ा (Jyeshth month) 

ज्येष्ठ मास को यह नाम 'ज्येष्ठा' नक्षत्र की वजह से मिला है| ज्येष्ठा हिन्दू पंचांग की काल गणना में उपयोग में आने वाले 27 नक्षत्रों में से 18वा नक्षत्र है| 
   

ज्येष्ठा नक्षत्र अंग्रेजी में (ज्येष्ठा in english)

ज्येष्ठा नक्षत्र को अंग्रेजी में स्कॉर्पियस 'scorpius' constellation कहते हैं|    

ज्येष्ठ महीने के महत्वपूर्ण तिथियां  (Important Days in ज्येष्ठ Month) 

शक संवत के वैशाख महीने की पूर्णिमा के बाद ही विक्रम सम्वत का ज्येष्ठ मास आरम्भ हो जाता है| बल्कि शक संवत का ज्येष्ठ महीना 15 तिथियों बाद अमावस्या के बाद शुरू होता है|   

क्यूंकि भारत में शक संवत (shaka calendar or panchang) को राष्ट्रीय दर्जा मिला है, नीचे दी गई तिथियों की शुरुआत उसी को ध्यान में रखकर बताई गई है|शक सम्वत (calendar) के हिसाब से शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से मास का आरम्भ होता है, आइये जानते हैं ज्येष्ठ मास की तिथियों के खास महत्व|

तिथि  महत्वता 
प्रतिपदा  
(कृष्ण पक्ष) 
   
द्धितीया   
तृतीया 
चतुर्थी 
पंचमी 
षष्ठी 
सप्तमी 
अष्टमी 
नवमी 
दशमी 

एकादशी 
अपरा एकादशी (Apra Ekadashi)  
द्धादशी 
त्रयोदशी 
चतुर्दशी 
अमावस्या 



प्रतिपदा 
(शुक्ल पक्ष) 

द्धितीया 
तृतीया 
चतुर्थी 
पंचमी 
षष्ठी 
सप्तमी 
अष्टमी 
नवमी 
दशमी 
एकादशी 
निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) 
द्धादशी 
त्रयोदशी 
चतुर्दशी 
पूर्णिमा 



ज्येष्ठ मास की माहात्म्य कथा 

महर्षि स्कन्दचि अपने शिष्यों को ज्येष्ठ माह का महत्व सुनाते हुए कहने लगे कि इस महीने में जल देने का विशेष महत्व है| इस माह में किया गया थोड़ा सा दान अधिक पुण्य प्रदान करता है| ज्येष्ठ मास में भगवान का सच्चे हृदय से ध्यान करने वाले मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है| ज्येष्ठ माह के देवता श्रीहरि विष्णु जी हैं| इस माह में अन्नदान, जलदान, व्यंजनदान, चन्दन दान, हलदान और जूतों का दान करने से शांति प्राप्त होती है| चन्दन का दान करने से देवता, ऋषि व पितृ प्रसन्न होते हैं| निर्जल छेत्र में प्राणी मात्र की रक्षा के लिए जल का दान करना चाहिए| छाया दार वृक्ष लगाने चाहिए और प्याऊ लगाने चाहिए| 

ऋषि बोले-"हे शिष्यों ! जो मनुष्य सक्षम होते हुए भी ज्येष्ठ मास में जल जैसा सुलभ दान नहीं करता वह मृत्यु के पश्चात नर्क की यातना भोगकर पपीहे की योनि में पड़ता है| इस विषय में मैं तुम्हे एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ|"

"त्रेता युग के अंत में महिष्मतिपुरी में वेद वेदान्तों को जानने वाला सुमंत नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्र के साथ रहता था| उसकी पत्नी का नाम गुणवती और पुत्र का नाम देवशर्मा था| एक दिन वह ब्राह्मण समाधी लगाने के लिए वन में गया| कुछ समय श्रीहरि का ध्यान कर वह ब्राह्मण वहां स्थित सुन्दर सरोवर का जल पीकर वृक्ष की छाँव में सो गया, जो कि सरोवर के एक दम नजदीक था| अब जो भी जीव जानवर सरोवर में जल पीने आता तो वह उसे देखकर डर कर भाग जाता और जल पीने से वंचित रह जाता| कुछ नन्हे जीव तो प्यास के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गए| 

सूर्य देव के अस्त होने पर वह ब्राह्मण अपने घर लौट आया लेकिन अनजाने में हुआ पाप भी उसके साथ-साथ आ गया| कुछ समय बाद ब्राह्मण अस्वस्थ हुआ और उसकी मृत्यु हो गई| उसकी पतिव्रता स्त्री भी अपने पुत्र और घर का त्याग कर ब्राह्मण के साथ सती हो गयी| अज्ञात पाप के दोष से वह ब्राह्मण मृत्यु के पश्चात कई समय तक नर्क की यातना भोगकर चातक की योनि में पड़ा और उसकी पत्नी चातकी की योनि में| 

चातक और चातकी के योनि में आकर दोनों अपने पुत्र के घर के समीप एक वृक्ष पर रहने लगे| चातक अपने पूर्व जन्म के कर्मों को याद कर जोर-जोर से रोता| उसके पुत्र ने रोने की आवाज़ सुनकर उन दोनों को वहां से भागने और न रोने को कहा परन्तु चातक का रोना बंद नहीं हुआ| थक हारकर उसके पुत्र ने वृक्ष को आग लगा दी जिससे चातक और चातकी के पंख जल गए और वह घायल अवस्था में नीचे पृथ्वी पर गिर पड़े| और आपस में अपने कष्टों की बात करने लगे| उनके बातों को सुनकर उनके पुत्र को बड़ा विस्मय हुआ कि ये तो मेरे माता-पिता हैं| 

वह ब्राह्मण पुत्र तब श्रेष्ठ ऋषियों के आश्रम में गया और अपने माता-पिता का सारा वार्तां सुना उनसे उनके उद्धार का उपाय पूछने लगा| तब ऋषियों ने उसे बताया तुम्हारे पिता पर पूर्व जन्म का अज्ञात पाप है| उससे मुक्ति के लिए तुम जलदान की व्यवस्था करो| 

तब ब्राह्मण पुत्र ने ऋषियों के कहे अनुसार अपने माता-पिता के नाम का निर्जन वन में प्याऊ लगा दीया जहाँ पर आने वाले मनुष्य, पक्षी और जीव-जंतु जल पीने लगे|  उसके इस पुण्य के प्रभाव से उसके माता-पिता चातक-चातकी के योनि से छूटकर अपने पुत्र को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हुए बैकुंठ धाम को चले गए|" इस प्रकार ज्येष्ठ माह में जलदान का विशेष महत्व है | | जो भी मनुष्य प्राणियों, पक्षियों और जीव-जंतुओं के लिए जल की व्यवस्था करता है वह इस लोक के सुखों को भोगकर अंत में बैकुंठ धाम को जाता है|                                     

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